
यदि कोई बच्चा प्राइमरी या हाई स्कूल में कोई गलती करता है, तो उस समय उसे सबसे अधिक सज़ा की नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। उसे ऐसे शब्दों की ज़रूरत होती है जो उसके भीतर आत्मविश्वास पैदा करें, न कि ऐसे वाक्यों की जो उसका आत्मविश्वास तोड़ दें।
दुर्भाग्य से हमारे समाज में अक्सर माता-पिता और शिक्षक यह मानते हैं कि कड़ी डाँट, तीखी आलोचना और अपमान ही सुधार का सबसे अच्छा तरीका है। जबकि मानव मनोविज्ञान इसके बिल्कुल विपरीत काम करता है।
मान लीजिए दो बच्चे हैं।
दोनों गणित में कमज़ोर हैं।
पहले बच्चे से रोज़ कहा जाता है—
“तुम्हें तो कुछ आता ही नहीं।”
“तुम हमेशा गलती करते हो।”
“तुमसे यह कभी नहीं होगा।”
“पता नहीं तुम कब समझदार बनोगे।”
हर गलती पर उसे पूरी कक्षा के सामने शर्मिंदा किया जाता है।
अब दूसरे बच्चे को देखिए।
उससे कहा जाता है—
“तुम बहुत अच्छी कोशिश करते हो।”
“मुझे पूरा विश्वास है कि तुम यह सवाल हल कर सकते हो।”
“चलो, गलती ढूँढ़ते हैं। अगली बार तुम इसे खुद सही कर लोगे।”
“मुझे तुमसे बहुत उम्मीद है।”
दोनों बच्चों को एक ही पाठ पढ़ाया गया, एक ही गलती बताई गई, लेकिन तरीका अलग था।
कुछ महीनों बाद आप देखेंगे कि दूसरा बच्चा न केवल अपनी गलतियाँ कम कर चुका होगा, बल्कि पहले से कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ सवाल हल कर रहा होगा। क्योंकि उसे यह विश्वास दिलाया गया कि वह सीख सकता है।
पहला बच्चा, जबकि उसमें भी क्षमता थी, धीरे-धीरे यह मानने लगेगा कि शायद सचमुच वह दूसरों से कमज़ोर है। वह सवाल पूछने से भी डरने लगेगा, नई चीज़ें आज़माने से भी घबराएगा, क्योंकि उसे हर बार अपमानित होने का डर रहेगा।
सुंदर लिखावट का एक सरल उदाहरण लेते हैं,
मान लीजिए दो बच्चों की हैंडराइटिंग खराब है।
एक बच्चे से कहा जाता है—
“यह क्या लिखा है? तुम्हारी लिखावट तो बिल्कुल खराब है। तुम्हें लिखना ही नहीं आता। अगर यही हाल रहा तो तुम ज़िंदगी में कुछ नहीं कर पाओगे।”
दूसरे बच्चे से कहा जाता है—
“तुम्हारी कोशिश अच्छी है। अगर तुम रोज़ सिर्फ़ दस मिनट अभ्यास करो, तो तुम्हारी लिखावट बहुत सुंदर हो सकती है। मुझे विश्वास है कि तुम सबसे अच्छी लिखावट लिख सकते हो।”
दोनों बच्चों की लिखावट एक जैसी थी, लेकिन दोनों के मन में अपने बारे में बनने वाली तस्वीर अलग हो गई।
एक ने सोचा—
“मैं खराब हूँ।”
दूसरे ने सोचा—
“मैं बेहतर बन सकता हूँ।”
और अक्सर इंसान वही बनने लगता है, जिस पर वह विश्वास करने लगता है।
सिर्फ़ पढ़ाई ही नहीं, हर क्षेत्र में यही सिद्धांत लागू होता है
यदि कोई बच्चा खेल में कमज़ोर है और उसका कोच रोज़ उससे कहे—
“तुमसे नहीं होगा, बाहर बैठो।”
तो संभव है कि वह हमेशा के लिए खेल से नफ़रत करने लगे।
लेकिन यदि कोच उससे कहे—
“तुम्हारी गति अच्छी है, बस थोड़ी और मेहनत की ज़रूरत है।”
तो वही बच्चा कुछ समय बाद टीम का सबसे अच्छा खिलाड़ी भी बन सकता है।
यही सिद्धांत भाषण कला, चित्रकला, संगीत, नई भाषा सीखने, कंप्यूटर, व्यवसाय और जीवन के लगभग हर क्षेत्र पर लागू होता है।
शब्द केवल आवाज़ नहीं होते, व्यक्तित्व भी गढ़ते हैं
बचपन में बार-बार कहे जाने वाले वाक्य बच्चे के मन का हिस्सा बन जाते हैं।
यदि उससे लगातार कहा जाए—
“तुम निकम्मे हो।”
“तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता।”
“तुम हमेशा ऐसे ही रहोगे।”
तो बहुत-से बच्चे धीरे-धीरे इन्हीं बातों को अपनी सच्चाई मान लेते हैं। उनका आत्मविश्वास कमज़ोर पड़ जाता है, वे जोखिम लेने से डरने लगते हैं, गलती करने से घबराते हैं और अपनी क्षमताओं को आज़माने से पहले ही हार मान लेते हैं।
इसके विपरीत यदि उनसे कहा जाए—
“तुम कर सकते हो।”
“गलती सीखने का हिस्सा है।”
“मुझे तुम पर विश्वास है।”
“अगली बार तुम पहले से बेहतर करोगे।”
तो यही शब्द उनके भीतर आत्मविश्वास, हिम्मत और लगातार बेहतर बनने की इच्छा पैदा करते हैं।
सुधार ज़रूर कीजिए, लेकिन आत्मसम्मान बचाकर
बच्चे की गलती बताना ज़रूरी है, लेकिन उसका आत्मसम्मान आहत करना कभी ज़रूरी नहीं होता।
आलोचना का उद्देश्य व्यक्तित्व को तोड़ना नहीं, बल्कि क्षमता को निखारना होना चाहिए।
ऐसे शिक्षक और माता-पिता जो केवल गलती देखते हैं, वे डर पैदा करते हैं।
और जो गलती के साथ बच्चे की क्षमता भी देख लेते हैं, वे उसका भविष्य बनाते हैं।
याद रखिए…
बच्चों को केवल शिक्षा नहीं दी जाती, बल्कि उन्हें अपने बारे में एक विश्वास भी दिया जाता है।
यदि आप उन्हें विश्वास दिलाएँगे कि वे सीख सकते हैं, तो वे सचमुच सीख जाएँगे।
यदि आप उन्हें यह विश्वास दिला देंगे कि वे असफल हैं, तो उनमें से बहुत-से बच्चे वास्तव में कोशिश करना ही छोड़ देंगे।
इसलिए अगली बार जब कोई बच्चा गलती करे, तो उसकी गलती पर नहीं, उसके भविष्य पर ध्यान दीजिए।
हो सकता है आपका एक वाक्य उसकी पूरी ज़िंदगी की दिशा बदल दे।
